मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, डीजीपी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से हस्तक्षेप की अपील; शिकायतों, काउंटर-वर्जन और डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग।
अम्बिकापुर, सरगुजा :–छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स से जुड़े चार एफआईआर का मामला चर्चा में है। जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले लोगों के खिलाफ कथित दुर्भावनापूर्ण शिकायतों और आपराधिक कानूनों के संभावित दुरुपयोग के आरोपों के बीच पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई है। इस संबंध में मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) और पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन सौंपे जाने का उल्लेख किया गया है।
आवेदनकर्ताओं ने मांग की है कि संबंधित प्राथमिकी, परस्पर विरोधी शिकायतों, नामजद व्यक्तियों की भूमिका और डिजिटल साक्ष्यों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ केवल आरोपों, आशंकाओं या सोशल मीडिया पर सक्रियता के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए।
4 अक्टूबर को दर्ज चार एफआईआर पर उठे सवाल….
आवेदन में 4 अक्टूबर 2026 को अम्बिकापुर के कोतवाली थाना और अजाक थाना में दर्ज बताई गई चार प्राथमिकी का उल्लेख करते हुए उनके घटनाक्रम, दर्ज होने के समय और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की समीक्षा की मांग की गई है।
आवेदन में उपलब्ध विवरण के अनुसार, एफआईआर क्रमांक 0702/2026 में आकांक्षा टोप्पो शिकायतकर्ता और धीरज सिंह नामजद बताए गए हैं। वहीं, एफआईआर क्रमांक 0015/2026, जो अजाक थाना में दर्ज बताई गई है, उसमें सुनीता सोनहा शिकायतकर्ता तथा रविन्द्र तिवारी नामजद बताए गए हैं।
इसी क्रम में एफआईआर क्रमांक 0703/2026 में शैलेन्द्र शर्मा शिकायतकर्ता हैं, जबकि आकांक्षा टोप्पो, अकील अहमद अंसारी और अन्य लोगों के नाम शामिल होने का उल्लेख है। चौथी प्राथमिकी क्रमांक 0704/2026 में धीरज सिंह शिकायतकर्ता तथा आकांक्षा टोप्पो और कैमरामैन दिनेश यादव नामजद बताए गए हैं।
आवेदनकर्ताओं का कहना है कि इन सभी मामलों को घटनाक्रम के संदर्भ में देखते हुए प्रत्येक प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों का अलग-अलग परीक्षण किया जाना चाहिए। हालांकि, इन विवरणों की पुष्टि संबंधित प्राथमिकी की प्रमाणित प्रतियों और पुलिस के आधिकारिक पक्ष से किया जाना आवश्यक है।

जनहित के मुद्दे उठाने वालों पर दबाव बनाने का आरोप….
आवेदनकर्ताओं ने आशंका जताई है कि प्रशासनिक कार्रवाई, सामाजिक घटनाओं और जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने लाने वाले कुछ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को शिकायतों तथा कथित अपमानजनक टिप्पणियों के जरिए दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है।
उनका कहना है कि लोकतंत्र में पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे आम जनता की समस्याओं को सामने लाने, संबंधित अधिकारियों तक शिकायतें पहुंचाने और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाने का काम करते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ दर्ज शिकायतों की जांच भी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए।
हालांकि, शिकायतों के पीछे दुर्भावना होने या किसी व्यक्ति के चरित्र-हनन की कोशिश किए जाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। जांच के बाद ही इन आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सोशल मीडिया पर सक्रियता को साजिश का आधार न बनाया जाए
आवेदन में यह भी कहा गया है कि किसी घटना की जानकारी साझा करना, सोशल मीडिया पोस्ट को आगे बढ़ाना या किसी पीड़ित का पक्ष सामने लाना अपने आप में आपराधिक षड्यंत्र का प्रमाण नहीं है।
आवेदनकर्ताओं के अनुसार, किसी गंभीर आपराधिक आरोप की जांच करते समय प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक भूमिका, उसके कथित कृत्य और उपलब्ध साक्ष्यों का आकलन जरूरी है। केवल एक ही मुद्दे पर कई लोगों के सक्रिय होने या उनके बीच संपर्क होने के आधार पर आपराधिक साजिश का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
उनका कहना है कि यदि किसी पोस्ट, वीडियो, ऑडियो या संदेश को आधार बनाकर आरोप लगाए गए हैं, तो उसकी वास्तविकता, स्रोत, संपूर्ण संदर्भ और प्रसार की परिस्थितियों की भी जांच होनी चाहिए।
डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच की मांग….
सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आवेदनकर्ताओं ने मांग की है कि संबंधित मामलों में इस्तेमाल किए गए वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, स्क्रीनशॉट, संदेशों और सोशल मीडिया पोस्ट की प्रामाणिकता की आवश्यकता के अनुसार तकनीकी जांच कराई जाए।
उनका कहना है कि अधूरी या संदर्भ से अलग की गई डिजिटल सामग्री के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर मूल फाइल, मेटाडेटा, उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य प्रासंगिक साक्ष्यों का विशेषज्ञों से परीक्षण कराया जाए।
आवेदनकर्ताओं के मुताबिक, इससे न केवल जांच की विश्वसनीयता बढ़ेगी, बल्कि सभी संबंधित पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर भी मिल सकेगा।
परस्पर विरोधी शिकायतों की स्वतंत्र विवेचना पर जोर….
आवेदनकर्ताओं ने कहा है कि जब एक ही घटनाक्रम में अलग-अलग पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हैं, तो प्रत्येक शिकायत की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए। एफआईआर दर्ज होने मात्र से आरोप साबित नहीं हो जाते और न ही बिना पर्याप्त जांच के किसी शिकायत को झूठा घोषित किया जा सकता है।
उन्होंने मांग की है कि संबंधित पक्षों के बयान, घटनाक्रम का क्रम, शिकायत दर्ज होने का समय, उपलब्ध वीडियो-ऑडियो रिकॉर्डिंग और अन्य दस्तावेजों का परीक्षण कर साक्ष्य-आधारित निष्कर्ष निकाला जाए।
साथ ही, गंभीर आपराधिक धाराओं का इस्तेमाल लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप किए जाने तथा विवेचना के दौरान किसी भी प्रकार के अनुचित दबाव से बचने की मांग भी की गई है।
वरिष्ठ अधिकारियों से की गई प्रमुख मांगें….
आवेदनकर्ताओं ने चारों प्राथमिकी की निष्पक्ष समीक्षा, प्रत्येक नामजद व्यक्ति की भूमिका का अलग-अलग परीक्षण, डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच और परस्पर विरोधी शिकायतों की पारदर्शी विवेचना की मांग की है।
इसके अलावा, उन्होंने पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के वैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के साथ-साथ शिकायतकर्ताओं के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करने की अपील की है। उनका कहना है कि जांच में किसी की सामाजिक या पेशेवर पहचान के बजाय तथ्यों और साक्ष्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट होगा वास्तविक घटनाक्रम….
सरगुजा में दर्ज बताए गए इन चार मामलों को लेकर अब संबंधित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आवेदनकर्ताओं ने मामले में संज्ञान लेकर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने की मांग की है।
फिलहाल, आवेदन में लगाए गए आरोपों और मांगों पर संबंधित पुलिस अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया तथा जांच की स्थिति की पुष्टि आवश्यक है। प्राथमिकी की प्रमाणित प्रतियों, संबंधित पक्षों के बयानों और डिजिटल साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
आवेदनकर्ताओं की प्रमुख मांग है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित हो, ताकि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो सके और निर्दोष व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।


