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CGN 24 > देश > चित्तौड़ की महारानी पद्मावती: साहस, सम्मान और बलिदान की अमर गाथा
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चित्तौड़ की महारानी पद्मावती: साहस, सम्मान और बलिदान की अमर गाथा

Last updated: May 27, 2026 9:14 am
Surya Narayan
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राजस्थान:– की वीर भूमि सदियों से शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान की कहानियों के लिए जानी जाती है। इन्हीं गौरवशाली गाथाओं में एक नाम सबसे अधिक सम्मान और भावनाओं के साथ लिया जाता है — Rani Padmini, जिन्हें रानी पद्मावती के नाम से भी जाना जाता है।
चित्तौड़गढ़ की महारानी पद्मावती केवल एक रानी नहीं थीं, बल्कि राजपूताना आन-बान और सम्मान की प्रतीक मानी जाती हैं।

इतिहास और लोककथाओं के अनुसार रानी पद्मावती का विवाह मेवाड़ के शासक Rawal Ratan Singh से हुआ था। कहा जाता है कि उनकी सुंदरता और बुद्धिमत्ता की चर्चा पूरे भारत में थी। इसी बीच दिल्ली सल्तनत के शासक Alauddin Khalji ने रानी पद्मावती के बारे में सुना और उन्हें पाने की इच्छा में चित्तौड़गढ़ पर हमला कर दिया।


बताया जाता है कि लंबे युद्ध के बाद जब चित्तौड़ की हार निश्चित दिखाई देने लगी, तब रानी पद्मावती ने अन्य राजपूत महिलाओं के साथ जौहर करने का निर्णय लिया। राजपूत परंपरा में जौहर को सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान माना जाता था। हजारों महिलाओं ने अग्निकुंड में प्रवेश कर अपने सम्मान की रक्षा की, जबकि राजपूत वीर अंतिम सांस तक युद्धभूमि में लड़ते रहे।

रानी पद्मावती की कहानी आज भी साहस और आत्मसम्मान की मिसाल मानी जाती है। हालांकि कई इतिहासकार इस कथा को ऐतिहासिक घटना से अधिक लोककथा मानते हैं। रानी पद्मावती का उल्लेख सबसे पहले सूफी कवि Malik Muhammad Jayasi ने अपनी प्रसिद्ध रचना Padmavat में किया था, जिसे 16वीं शताब्दी में लिखा गया था।

आज भी Chittorgarh Fort और वहां स्थित पद्मिनी महल देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। हर वर्ष हजारों लोग इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने पहुंचते हैं और राजपूताना वीरता की इस अमर कहानी को याद करते हैं।

रानी पद्मावती का नाम भारतीय इतिहास और लोकगाथाओं में सदैव सम्मान, त्याग और नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में अमर रहेगा।

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