11 साल से Facebook पर हथियारों वाली तस्वीरें, अब पुलिस की नजर पर सवाल!
अंबिकापुर। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक कथित ऑडियो को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच अधिवक्ता संजय अंबष्ट की Facebook Wall पर वर्षों से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध बताई जा रही कुछ पुरानी तस्वीरों ने हथियारों की वैधता, स्वामित्व और पुलिस की निगरानी को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि 5 जनवरी 2015 की एक तस्वीर में संजय अंबष्ट एक AK-pattern rifle जैसे दिखाई देने वाले हथियार को हाथ में लिए नजर आते हैं। हथियार के नीचे लगा उपकरण भी दिखाई देता है, जिसकी वास्तविक पहचान—क्या वह UBGL है अथवा कोई अन्य attachment—विशेषज्ञ परीक्षण के बिना तय नहीं की जा सकती।
लेकिन तस्वीर ने सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—आखिर हथियार था किसका?
क्या यह किसी पुलिस अधिकारी या सुरक्षा बल का हथियार था? क्या यह किसी शासकीय armoury से संबंधित था? हथियार का serial number क्या था? और यदि यह वास्तविक firearm था तो उसे किसी नागरिक के हाथ में किन परिस्थितियों और किस अनुमति के तहत दिया गया था?
21 फरवरी 2015 की एक अन्य Facebook तस्वीर में pistol/handgun जैसा हथियार दिखाई देने का दावा है, जबकि 25 जून 2017 से संबंधित सामग्री में scope लगा long firearm/rifle जैसा हथियार नजर आता है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि इन हथियारों का स्वामित्व, लाइसेंस और स्रोत क्या था।
Arms Act, 1959 की धारा 3 के अनुसार सामान्यतः firearm या ammunition को acquire, possess अथवा carry करने के लिए लाइसेंस आवश्यक है, हालांकि कानून में निर्धारित अपवाद भी हैं। वहीं किसी हथियार को केवल तस्वीर देखकर prohibited arm घोषित नहीं किया जा सकता; उसकी वास्तविक पहचान और कानूनी स्थिति की पुष्टि आवश्यक होगी।

नाबालिग के हाथ में हथियार जैसी तस्वीर ने बढ़ाए सवाल
मामला सिर्फ एक तस्वीर तक सीमित नहीं बताया जा रहा है।
7 अक्टूबर 2015 की एक तस्वीर में संजय अंबष्ट के नाबालिग पुत्र के हाथ में long-barrel firearm/shotgun जैसा दिखाई देने वाला हथियार नजर आने का दावा है। एक अन्य तस्वीर में बच्चे के शरीर पर firearm का sling/strap दिखाई देता है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल बच्चे की उम्र और उस समय की परिस्थितियों से जुड़ा है—क्या वह वास्तविक firearm था? हथियार किसका था? क्या वह unloaded था? क्या कोई अधिकृत वयस्क उस समय निगरानी में था? और क्या यह किसी वैध प्रशिक्षण गतिविधि का हिस्सा था?
पुराने Arms Rules, 1962 के Rule 16 में 12 से 16 वर्ष के व्यक्ति को वयस्क instructor या licensee की तत्काल उपस्थिति/प्रत्यक्ष निगरानी में firearm training की अनुमति का प्रावधान था। इसलिए केवल तस्वीर के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उस तस्वीर की वास्तविक परिस्थिति और हथियार की वैधता की जांच जरूरी होगी।
28 जुलाई 2018 की एक अन्य तस्वीर में उसी बच्चे के हाथ में तलवार जैसी वस्तु दिखाई देने का भी दावा किया जा रहा है, जिससे पूरे मामले की परिस्थितियों को लेकर सवाल और बढ़ गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—2015 की तस्वीरों पर अब तक जांच क्यों नहीं?
यह पूरा मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पहली बताई जा रही तस्वीर की तारीख 5 जनवरी 2015 है। यानी तस्वीर करीब 11 साल पुरानी बताई जा रही है।
यदि ये तस्वीरें इतने लंबे समय तक सार्वजनिक Facebook Wall पर उपलब्ध थीं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि—
क्या कभी पुलिस या संबंधित प्रशासन की नजर इन तस्वीरों पर पड़ी?
क्या हथियारों की पहचान कराने की कोशिश हुई?
क्या उनके serial number और ownership की जांच की गई?
क्या किसी licence या authorization का रिकॉर्ड देखा गया?
और यदि इनमें से कोई हथियार पुलिस अथवा सुरक्षा बल से संबंधित था, तो उसकी custody और उपयोग से जुड़े रिकॉर्ड क्या कहते हैं?

तस्वीरें अपराध का प्रमाण नहीं, लेकिन जांच का आधार जरूर?
किसी सोशल मीडिया तस्वीर के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता। तस्वीर में दिखाई देने वाली वस्तु वास्तविक firearm है या replica/air weapon/training weapon, यह भी विशेषज्ञ जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।
लेकिन यदि तस्वीरों में वास्तविक firearms दिखाई दे रहे हैं, तो उनके स्रोत, स्वामित्व, लाइसेंस, serial number, authorization और तस्वीर खींचे जाने की परिस्थितियों का सत्यापन किया जाना एक तथ्यात्मक जांच का विषय हो सकता है।
यही वह बिंदु है जहां अब पुलिस प्रशासन से स्पष्टता की अपेक्षा की जा रही है।
हथियार कौन-सा था?
किसके नाम पर था?
कहां से आया था?
क्या उसके लिए वैध लाइसेंस था?
किस परिस्थिति में उसे हाथ में लिया गया?
और नाबालिग के हाथ तक वह हथियार कैसे पहुंचा?
इन सवालों का जवाब Facebook की तस्वीरों में नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, लाइसेंस दस्तावेज और निष्पक्ष जांच में मिलेगा।
कथित ऑडियो के बाद पुरानी तस्वीरें फिर चर्चा में….
https://www.facebook.com/share/v/19aHTCq25n/
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब सोशल मीडिया पर एक कथित ऑडियो वायरल होने की चर्चा है, जिसकी आवाज को संजय अंबष्ट से जोड़ा जा रहा है। हालांकि ऑडियो की स्वतंत्र forensic authentication और speaker identification की पुष्टि होना अभी अलग विषय है।
इसी पृष्ठभूमि में उनकी पुरानी सार्वजनिक Facebook सामग्री दोबारा चर्चा में आई है और हथियारों वाली तस्वीरों ने पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सरगुजा पुलिस इन तस्वीरों को महज सोशल मीडिया सामग्री मानकर छोड़ती है या हथियारों की वास्तविक पहचान, लाइसेंस, ownership और authorization की औपचारिक जांच करती है।
क्योंकि सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि तस्वीरों में दिखाई दे रहे हथियार आखिर थे किसके—और करीब 11 वर्षों तक इस सवाल का जवाब तलाशने की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई।


