सात दिन पहले नोटिस नहीं देने का आरोप, ₹1.12 करोड़ की कार्ययोजना में असमान आवंटन पर भी उठाए सवाल
सूरजपुर:– जनपद पंचायत प्रतापपुर में 16वें वित्त आयोग के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 की करीब ₹1.12 करोड़ की कार्ययोजना को लेकर विवाद गहरा गया है। जनपद सदस्य राजू सिंह, राजकुमारी ध्रुवे, राजेश पोर्ते, विनोद नेताम और अनीता जायसवाल सहित प्रभावित सदस्यों ने कलेक्टर एवं जिला पंचायत सीईओ से सामूहिक शिकायत कर कार्ययोजना की प्रक्रिया और आवंटन की जांच की मांग की है।
शिकायत में सदस्यों ने 3 सितंबर 2026 को हुई कथित सामान्य सभा की बैठक की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि बैठक से सात दिन पहले नियमानुसार नोटिस तामील नहीं कराया गया। इसके बावजूद कार्ययोजना को बहुमत से पारित किए जाने की बात शिकायत में कही गई है। सदस्यों ने बैठक से संबंधित नोटिस, डिस्पैच रजिस्टर, एजेंडा, उपस्थिति पत्रक और कार्यवाही विवरण की जांच कराने की मांग की है।
कार्ययोजना पारित थी तो 6 सितंबर तक प्रस्ताव क्यों?
शिकायतकर्ताओं ने एक अहम सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि 3 सितंबर को कार्ययोजना पारित हो चुकी थी, तो 6 सितंबर तक विकास कार्यों के प्रस्ताव क्यों मंगाए गए? शिकायत के मुताबिक जनपद सदस्य अनीता जायसवाल ने 6 सितंबर को करीब 5 लाख रुपये के प्रस्ताव प्रस्तुत किए थे, जबकि कार्ययोजना में उनके क्षेत्र से करीब 50 हजार रुपये के कार्य शामिल होने की बात कही गई है।

डिजिटल रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच की मांग
सदस्यों ने कार्ययोजना में बाद में किसी तरह के बदलाव अथवा बैक-डेटिंग की आशंका जताते हुए eGramSwaraj/BPDP के Digital Audit Trail, User ID, Modification History, Upload History और Metadata सुरक्षित रखने तथा स्वतंत्र साइबर फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
आवंटन में असमानता का भी आरोप
शिकायत में राशि के वितरण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। सदस्यों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में ₹50 हजार से ₹2 लाख, जबकि अन्य क्षेत्रों में ₹10 से ₹20 लाख तक के कार्य रखे गए हैं। उन्होंने 16वें वित्त आयोग के लागू वितरण नियमों, राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों तथा आबादी एवं क्षेत्रफल आधारित गणना के आधार पर आवंटन की जांच की मांग की है।
जांच पूरी होने तक भुगतान प्रक्रिया रोकने की मांग
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि जांच पूरी होने तक विवादित कार्ययोजना से संबंधित प्रशासकीय स्वीकृति (AS), तकनीकी स्वीकृति (TS), वर्क ऑर्डर और भुगतान की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। साथ ही यदि जांच में बैक-डेटिंग, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड अथवा किसी प्रकार की डिजिटल कूटरचना प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
जनपद सदस्यों ने चेतावनी दी है कि यदि मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई या विवादित कार्यों में भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ी तो वे छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, बिलासपुर की शरण लेने के लिए बाध्य होंगे। अब शिकायत के बाद प्रशासनिक जांच में बैठक की प्रक्रिया, राशि आवंटन और डिजिटल रिकॉर्ड से जुड़े तथ्यों की जांच किस स्तर तक होती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।


