सरगुजा/छत्तीसगढ़
भारत सम्मान के संपादक जितेन्द्र कुमार जायसवाल के पिता का निधन हो गया है। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। वे अपने जीवन मूल्यों, सादगी और त्यागपूर्ण स्वभाव के लिए जाने जाते थे।
नर्म आंखों से स्मृतियों को साझा करते हुए संपादक जितेन्द्र कुमार जायसवाल ने कहा
“मेरे पिता जी केवल एक हिम्मती इंसान ही नहीं थे, बल्कि त्याग और सादगी के प्रतीक थे। उनका जीवन ‘नेकी कर, दरिया में डाल’ की कहावत का सच्चा उदाहरण था। उन्होंने हमेशा दूसरों की मदद की, बिना किसी अपेक्षा या दिखावे के। वे कहा करते थे—‘भलाई अगर गिनाने लगो तो वह सौदा हो जाता है, नेकी नहीं।’ यही सोच उनकी पहचान बन गई।”

सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने जीते-जी अपनी पैतृक संपत्ति पर पूर्ण दावा नहीं किया। यह उनके उदार और त्यागपूर्ण स्वभाव का प्रमाण है। उनके लिए पारिवारिक सौहार्द और रिश्तों की अहमियत किसी भी ज़मीन-जायदाद से बढ़कर थी। वे हमेशा घर-परिवार को जोड़ने, सबको साथ लेकर चलने और अपने हिस्से से ज़्यादा दूसरों को देने की राह पर चले।
जितेन्द्र कुमार जायसवाल ने भावुक होकर कहा
“उनका जाना हमारे लिए अपूरणीय क्षति है, लेकिन उनका जीवन-दर्शन, उनकी नेकी और निस्वार्थ सोच हमेशा हमें प्रेरणा देती रहेगी। वे हमें सिखा गए कि इंसान का असली कद उसके त्याग और करुणा से नापा जाता है, न कि उसकी संपत्ति से। हम वचन देते हैं कि उनकी शिक्षाओं और मूल्यों को अपने जीवन में उतारेंगे। पिता जी अमर रहेंगे हमारी यादों और कर्मों में।”
स्वर्गीय के निधन पर सामाजिक, साहित्यिक और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया है और उनके परिवार के प्रति संवेदनाएं प्रकट की हैं।


