विशेष रिपोर्ट/बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
बिलासपुर। जिले के मस्तूरी थाना क्षेत्र से सामने आया एक मामला छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि पत्रकार डी.पी. गोस्वामी और उनकी पत्नी दिव्या गोस्वामी को अपराधियों से अधिक भय पुलिस तंत्र के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों से है। मामला केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है, जहाँ शिकायतकर्ता ही संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है।
थाने में गिरफ्तारी नहीं, “रणनीति बैठक” का आरोप
सूत्रों के अनुसार, गृह मंत्री के निर्देश के बाद जब संबंधित पुलिस अधिकारियों पर तबादले की तलवार लटकी, तो मस्तूरी थाने में एक असामान्य घटनाक्रम सामने आया। आरोप है कि आरोपियों को थाने बुलाया गया, लेकिन कार्रवाई के लिए नहीं, बल्कि उन्हें यह समझाने के लिए कि शिकायतकर्ता पत्रकार के खिलाफ ऊपरी अधिकारियों को किस प्रकार शिकायत करनी है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह पुलिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
निजी आवास में ‘बैठक’ और सवालों का दौर भनेश्वर रोड स्थित एक निजी आवास में 22 दिसंबर की रात कथित तौर पर बैठक आयोजित होने की चर्चा है, जहाँ आरोपी पक्ष और कुछ प्रभावशाली लोग मौजूद थे। इस बैठक को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ निजी आयोजन था या फिर पत्रकार के खिलाफ रणनीति बनाने का मंच। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इस संबंध में CCTV फुटेज की निष्पक्ष जांच हो, तो कई परतें खुल सकती हैं।

सूचना देने वाला ही बना निशाना पत्रकार द्वारा कबाड़ चोरी से संबंधित सूचना पुलिस को दी गई थी, लेकिन आरोप है कि उसी सूचना का दुरुपयोग करते हुए पुलिसकर्मियों ने कथित रूप से आरोपियों को लाभ पहुंचाया। पत्रकारों का कहना है कि यह “सूचना तंत्र” नहीं बल्कि “सेटिंग तंत्र” का उदाहरण है, जहाँ ईमानदार शिकायतकर्ता ही असुरक्षित हो जाता है।
एसडीओपी और विवादित तैनाती पर सवाल
मामले में एसडीओपी लालचंद मोहले की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि एक जांचकर्ता पुलिसकर्मी शिव चंद्रा, जिन्हें स्थानीय स्तर पर “इंतजाम अली” के नाम से जाना जाता है, लंबे समय से विभिन्न थानों में रणनीतिक रूप से तैनात किए जाते रहे हैं। आरोप है कि उनकी तैनाती के दौरान कोल, राखड़, रेत और क्रेशर माफिया जैसे संगठित अवैध कारोबारियों को संरक्षण मिलता रहा।
शिव चंद्रा का नाम पहले भी कुख्यात मिट्टी तेल कांड में सामने आ चुका है, जिसमें न्यायालय द्वारा कड़ी टिप्पणी और अपराध दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद, आरोप है कि वही नेटवर्क मस्तूरी क्षेत्र में फिर से सक्रिय हो रहा है।
तबादला आदेश रोकने के आरोप
सूत्र बताते हैं कि एसडीओपी कार्यालय में पदस्थ दो आरक्षकों के तबादले महीनों से लंबित हैं। आरोप है कि यह रोक कथित उगाही व्यवस्था को बनाए रखने के लिए करवाई गई, जिससे संगठित अवैध गतिविधियों पर कोई असर न पड़े।
एक महिला की भूमिका भी जांच के घेरे में
मामले में एक महिला की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि उक्त महिला को अनुकंपा नियुक्ति के तहत शासकीय नौकरी मिली है, लेकिन वह नियमित रूप से ड्यूटी न कर न्यायालय परिसर में कथित तौर पर “क्लाइंट तलाशने” और अवैध उगाही जैसी गतिविधियों में संलिप्त रहती है। सूत्रों का दावा है कि उसकी गतिविधियां न्यायालय परिसर के CCTV कैमरों में दर्ज हैं। यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन बल्कि न्यायिक गरिमा से जुड़ा गंभीर मामला बन सकता है।
पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा प्रश्न
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि यदि एक पत्रकार भ्रष्टाचार या अवैध गतिविधियों पर सवाल उठाता है, तो वह अपराधियों के साथ-साथ सिस्टम के भीतर मौजूद कथित गठजोड़ के निशाने पर आ सकता है। पत्रकार संगठनों का कहना है कि यदि इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए खतरनाक संकेत होगा।
अब निगाहें शासन-प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।


