बलरामपुर/ वाड्रफनगर CGN 24 विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में जिस किसान के वोट और धान से सरकारें बनती हैं, आज वही किसान धान बेचने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। सरकार मंचों से किसान हितैषी होने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर क्षेत्र अंतर्गत बरती कला धान उपार्जन समिति से सामने आया मामला न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है।
धान खरीदी केंद्र बना उत्पीड़न केंद्र।
जानकारी के मुताबिक एक किसान अपनी उपज लेकर धान उपार्जन केंद्र पहुंचा। नियमानुसार समिति को अनलोडिंग, ढेर लगवाना, सिलाई, लेबलिंग और परिवहन जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध करानी थीं, लेकिन समिति प्रबंधक ने साफ शब्दों में हाथ खड़े कर दिए। मजबूर किसान से कहा गया—
“खुद ही धान उतारो, खुद ही इंतजाम करो।”
यानी सरकार की व्यवस्था कागजों में और किसान जमीन पर अकेला।


वीडियो बनाने पर भड़का प्रशासन।
जब किसान ने अपनी पीड़ा को कैमरे में कैद करना शुरू किया, तो मामला और गंभीर हो गया। मौके पर मौजूद तहसीलदार, जिन्हें आमतौर पर न्याय और संतुलन का प्रतीक माना जाता है, उन्होंने किसान की बात सुनने के बजाय उसे वीडियो बंद करने की धमकी दी।
इतना ही नहीं, किसान को पुलिस बुलाकर अंदर कराने की बात कहकर डराया गया।
वीडियो में साफ दिख रहा है कि किस तरह एक अधिकारी, जो जनता का सेवक होना चाहिए, वही किसान की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है।
सवाल जो सरकार को जवाब देना होगा।



जब नियमों में सभी सुविधाएं तय हैं, तो समिति प्रबंधन ने किसान को क्यों तंग किया?
तहसीलदार ने किसान का पक्ष लेने के बजाय उसे धमकाया क्यों?
क्या धान खरीदी केंद्र अब किसानों के लिए नहीं, बल्कि अधिकारियों की मनमानी के लिए चल रहे हैं?
अगर व्यवस्था इतनी पारदर्शी है, तो एक किसान के वीडियो से डर क्यों?
किसान ही सबसे कमजोर कड़ी क्यों?
बरती कला समिति का यह मामला कोई अपवाद नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां किसान आज भी सबसे कमजोर कड़ी बना हुआ है। समर्थन मूल्य की बड़ी-बड़ी घोषणाएं तब खोखली साबित होती हैं, जब किसान को अपना हक मांगने पर डराया-धमकाया जाए।
कार्रवाई की मांग
इस मामले में
✔️ समिति प्रबंधक की भूमिका की जांच
✔️ तहसीलदार के आचरण की निष्पक्ष जांच
✔️ किसान को डराने-धमकाने वालों पर सख्त कार्रवाई
✔️ धान उपार्जन केंद्रों में सुविधाओं की वास्तविक समीक्षा
अब सवाल सिर्फ एक किसान का नहीं है, सवाल छत्तीसगढ़ के हर अन्नदाता के सम्मान का है।
अगर आज आवाज उठाने वाले किसान को चुप करा दिया गया, तो कल कोई भी किसान बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।


