रायपुर/बलरामपुर/विशेष व्यंग्यात्मक रिपोर्ट
बलरामपुर में इन दिनों सन्नाटा नहीं, सिस्टम की घबराहट पसरी हुई है। वजह कोई आंदोलन या छापा नहीं, बल्कि एक पत्रकार की कलम है, जिसने ऐसी चिट्ठी लिखी कि उसके “छर्रे” सीधे राष्ट्रपति भवन तक जा पहुँचे।
मामला छत्तीसगढ़ के चर्चित कारोबारी विनोद अग्रवाल उर्फ ‘मग्गू सेठ’ से जुड़ा है और अंदाज़ ऐसा कि सच, व्यंग्य बनकर सत्ता को आईना दिखा गया।
वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र की यह चिट्ठी कोई साधारण शिकायत नहीं, बल्कि वह दस्तावेज़ है जिसमें अपराध, प्रशासनिक संरक्षण और लोकतंत्र की चुप्पी को व्यंग्य की धार पर परोसा गया है।
क्रशर कांड: हादसा नहीं, ‘मोक्ष प्राप्ति’!
बरियों क्षेत्र में आदिवासी शिव नारायण की मौत को आम लोग क्रशर हादसा मानते हैं, लेकिन पत्र में इसे अलग ही नजरिये से रखा गया है।
व्यंग्य कहता है “मग्गू सेठ के क्रशर में मरना सौभाग्य है, सीधा स्वर्ग का टिकट।”ऐसे में पुलिस द्वारा जांच करना भी “अनावश्यक उत्साह” बताया गया है।

सबूतों का हवन: फाइलें नहीं, पूरा दफ्तर जला
खनिज घोटाले के सबूत मिटाने के लिए फाइलें गायब करना पुरानी सोच है।
पत्र के मुताबिक, बलरामपुर खनिज कार्यालय में आग लगना कोई अपराध नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज़ों का ‘अग्नि यज्ञ’ था— ताकि घोटालों की आत्मा को मोक्ष मिल सके।
फरार अपराधी, घर में जश्न।

पुलिस रिकॉर्ड में मग्गू सेठ और उनके भाई प्रवीण अग्रवाल “फरार” हैं।
हकीकत? जून–जुलाई 2025 में अपने ही घर में शादी की सालगिरह की दावत।
पत्रकार ने तंज कसा— “पुलिस देश-विदेश ढूंढती रही, सेठ घर में बिरयानी खाते रहे।”
मुफ्त ‘मुक्ति धाम’ योजना।
गहरे खुले कुएँ— जिनमें मवेशी गिरकर मरते हैं और इंसान आत्महत्या कर लेते हैं पत्र में इन्हें सेठ जी की समाजसेवा बताया गया है:
“निःशुल्क अंतिम यात्रा सुविधा, बिना आवेदन के।”
आदिवासी कल्याण: जमीन छीने, नाम अमर करें
आदिवासियों की जमीन पर कब्ज़ा कर उसे बेनामी संपत्ति में बदलना
पत्र के अनुसार यह भी कल्याणकारी योजना है, ताकि आदिवासियों के नाम “रिकॉर्ड में अमर” हो जाएं।
पहाड़ी कोरवाओं को जंगल लौटाने को विकास का नया मॉडल बताया गया है।
पत्रकारिता का दमन और पुलिस का संरक्षण।
जो पत्रकार महिमा गान नहीं करता, उस पर झूठे केस।
पत्र में साफ कहा गया है— लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, तिजोरी के नीचे दबा है, और पुलिस सहयोगी की भूमिका में।
कानून-मुक्त रोज़गार मॉडल।
महामाया स्टोन क्रशर— सेठ के फरार होने पर सील हुआ, फिर प्रशासन की “दया दृष्टि” से चालू।
पत्रकार का तंज “ऐसे क्रशर पूरे प्रदेश में खुलने चाहिए, ताकि नियमों से मुक्त रोजगार मिले।”
क्राइम कुंडली: 2009 से 2025 तक
2020: गैर इरादतन हत्या (304-II)
2015: अपहरण (365, 342)
बलवा, मारपीट, गाली-गलौज — नियमित अध्याय
पत्र का सार: सिस्टम का ‘मोय-मोय’
पत्र के अंत में व्यंग्य अपने चरम पर है
अधिकारियों को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाए
सेठ पर लगे आरोप हटाए जाएं
शिकायत करने वाले आदिवासी और पत्रकार जेल भेजे जाएं
जो अफसर कार्रवाई सोचें, उन्हें बर्खास्त किया जाए
और अंत में राष्ट्रपति से निवेदन
“महोदया, यह व्यंग्य नहीं, व्यंग्यात्मक सत्य है।”
अब सवाल यह है कि दिल्ली का सिस्टम इस ‘लोकल डॉन’ की हेकड़ी तोड़ेगा, या यह चिट्ठी भी फाइलों के साथ मोक्ष पा जाएगी?
यह रिपोर्ट व्यंग्य के माध्यम से सत्ता, प्रशासन और अपराध के गठजोड़ पर सवाल उठाती है।


