सूरजपुर:–जिले के भैयाथान क्षेत्र के ग्राम बंजा स्थित शासकीय प्राथमिक शाला कन्या आश्रम में रहने वाली छात्राओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बजाय नर्क जैसा जीवन जीना पड़ रहा है। जर्जर भवन, पानी-बिजली की किल्लत, गंदे शौचालयों के अलावा अब भोजन में भी कागजी खानापूर्ति की शिकायतें सामने आ रही हैं। सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग व कन्या आश्रम अधीक्षिका की लापरवाही से बजट के बावजूद यहां की स्थिति बदतर बनी हुई है। पहचान जाहिर ना करने की शर्त पर छात्राओं ने बताया कि निर्धारित मेनू के नाम पर आधा-अधूरा भोजन मिलता है, और कन्या आश्रम अधीक्षिका ज्यादातर नदारत रहती हैं उनको ना ही बच्चों की चिंता और ना ही उनके स्वास्थ्य से मतलब है जिससे वे कई दिन भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। क्या ये आदिवासी कल्याण की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं…?
भवन की जर्जर स्थिति से मंडरा रहा खतरा।
आश्रम भवन की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि हर पल अनहोनी की आशंका बनी रहती है। कमरों में सीपेज, छत से लेकर दिवालों पर जगह जगह प्लास्टर उखड़कर गिर रहा है। एक छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, रात को सोते समय डर लगता है कि कहीं भवन ढह न जाए। पढ़ाई पर मन नहीं लगता। आपकों बताते चलें कि विभाग को पूरी हकीकत की जानकारी है लेकिन सहायक आयुक्त ने कोई ध्यान नहीं दिया। मरम्मत के लिए बजट आवंटित होने के बावजूद काम छिटपुट कराकर स्थिति को जस का तस आलम में भगवान भरोसे जवाबदेह अधिकारीयों ने छोड़े रखा है।

पानी-बिजली का संकट, पढ़ाई प्रभावित।
पेयजल की व्यवस्था नाममात्र की है। यहां पर बच्चों को शुद्ध पेयजल नहीं मिलता छात्राओं को पीने व नहाने के पानी के लिए जद्दोजहद करना पड़ता है। बिजली की आपूर्ति तो है लेकिन कही बल्व का परेशानी तो कही लाइट ही नहीं लगा है सभी कार्य अनियमित है, जिससे शाम को अंधेरा छा जाता है। पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर एक छात्रा ने बताया, स्कूल जाने से पहले घंटों पानी भरने में लग जाते हैं, पढ़ाई का समय कम हो जाता है।
शौचालय व स्नानागारों में स्वच्छता का टोटा।
छात्रावास के शौचालय व स्नानागार गंदगी से भरे पड़े हैं। बदबू व कीटाणुओं का सामना रोजाना करना पड़ता है। छात्राएं खुद सफाई करती हैं, लेकिन साधनों की कमी से मुश्किलें बढ़ जाती हैं। स्कूल से लौटकर जब छात्राएं आराम की जगह पर गंदगी के बीच रहती है तो बीमारीयों की संभावनाएं बनी रहती है।


भोजन में अनियमितता, निर्धारित मेनू पर सवाल।
सबसे गंभीर शिकायत भोजन से जुड़ी है। सरकार द्वारा निर्धारित मेनू में दाल, चावल, सब्जी, रोटी व दूध शामिल है, लेकिन वास्तविकता में पानी जैसी दाल, बेस्वाद चावल व कभी-कभी केवल रोटी-सब्जी ही मिलती है। दूध तो महीनों से गायब है। यहां की एक पूर्व छात्रा ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, रजिस्टर में पूरा मेनू लिखा जाता है, लेकिन सप्लाई आधी-अधूरी आती है। बाकी का पैसा कहां खर्च होता है…? रसोइया व ठेकेदार के साथ अधीक्षिका की मिलीभगत का आरोप लगाया जा रहा है। शिकायतों पर जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है,।
सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त, रातें डरावनी।
छात्रावास में आहाता का निर्माण लंबित है।कई दफा अधीक्षिका रात को कर्मचारियों के भरोसे घर चली जाती हैं, जिससे असुरक्षा का माहौल रहता है।यह सिलसिला कोई नया नहीं है लेकिन मंडल संयोजक से लेकर सहायक आयुक्त की उदासीनता से ये हाल जारी है और अधीक्षिका की मनमानी का दौर बरकरार है।
विकास योजनाओं का कड़वा सच बयां करती छात्रावास की हकीकत।
अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा किया जाता है, लेकिन भैयाथान का यह छात्रावास विकास की विफलता का प्रतीक बन चुका है। अब इस गंभीर विषय पर जिला प्रशासन कब-तक संज्ञान लेगा यह तो आने वाले दिनों में सामने आएगा क्योंकि सूत्रों की मानें तो हर छात्रावासों से हर माह एक निश्चित कमीशन की राशि नौनिहालों के हक पर डाका डाल छात्रावास अधीक्षिको द्वारा मंडल संयोजक के माध्यम से सहायक आयुक्त कार्यालय तक पहुंचती है। ऐसे आलम में ऐसी लापरवाहियों पर लंबे अरसे से पर्दा डालने की कवायद जारी है और किसी को भी इन छात्रों के भविष्य की चिंता शायद ही रहती है।


